आस अधरों पर लिए वो तिश्नगी तक आगये ।
दर्द के सहरा में भटके और नदी तक आगये ।
उससे ग़ाफ़िल हम रहे जीते रहे अपनी तरह
पीर जब बढ़ने लगी तो बन्दगी तक आगये ।
अनिल उपहार
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