Wednesday, June 29, 2016

कविता पगली

वह पगली
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मर्यादा की दहलीज़ पर
रोज़ जलाती है वो दीया
अदब और संस्कारों का ।

उसके धवल परिधान
चिढ़ाते थे
चंद्रमा की शुभ्र ज्योत्स्ना कों ।

सूरज की पहली किरण
बिखेरती थी अपनी
स्वर्ण रश्मियाँ
उसके सूने आँगन में ।

उसकी कलम का एक एक शब्द
रचता था साहित्य के भव्य महल
और
हर शिखर उसकी छंदमाल से
हो उठता था अभिमंत्रित ।

उसकी बातों में था
गज़ब का सम्मोहन ।
हर कोई खिंचा आता था
उसको पढ़ने ।

उसे कहाँ था अहसास
खुद की गुरुता का ।
वो तो अनजान अल्हड
भरती रहती प्रकृति के रंग
अपनी कूँची से ।

लेकिन बोल उठता था उसका मौन भी
उसकी हर तस्वीर में ।
हाँ मैंने पढ़ा था कई बार
उसकी आँखों में छलकते दर्द कों
महसूस किया था
उसकी सिसकती सांसो कों
शायद वह सीख रही थी
खुद से लड़ना
पर हाय!

संवाद हीनता की पराकाष्टा
को क्या कहें ।
हिंदी कविता की तरह
हर बार
छली जाती रही वह ..........
एक पगली ऐसी भी ।

--------अनिल उपहार --------

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