कहने को व्याकुल है मन भी
घोर उदासी सहता तन भी ।
चले विषमताओं की आंधी
रूठी डोर जो प्रीत की बांधी ।
ऐसे में तेरा जाना भी रास नही बिलकुल आता है ।
आजाओ निर्मोही साजन गीत विरह के मन गाता है ।
अनिल उपहार
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