Tuesday, January 10, 2017

नोटबंदी (मुक्तक)

कह  रहा अब नोट बंदी पर यहाँ आवाम है ।

मजलूमों की भीड़ में अलसायी सुबहो शाम है ।

होगये मुंह  से निवाले दूर अब तो रूठकर

मुफलिसी के दौर में सच ज़िन्दगी इलज़ाम है ।

अनिल उपहार

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