अरमानो की दहलीज़ पर
जलाते रहे हर बार
प्रतीक्षा के दीये
फ़िज़ा में घुली
स्वार्थ की गर्द
कर देती थी एक चुभन पैदा
किरकिरी सी
मन की आँखें
हो उठती थी लाल
एक अनचाहे दर्द से ।
शब्दकोश था विवश
नही कोई उपमा और
उपमान ।
अनुप्रास भी तो था अधूरा
कोई कैसे लिखता
टूट कर बिखर जाने की वज़ह ।
अनिल उपहार
No comments:
Post a Comment