Monday, January 9, 2017

मुक्तक

चाहे ज़ख्म सहे होंगें हर चोट नेह की भाषा है ।

तारे गिन गिन रात गुज़ारें जीवन की अभिलाषा है ।

दोराहे पर शब्द मौन है भोर खड़ी है द्वारे पर

रात यही कहती है दिन से घोर निराशा में आशा है ।

अनिल उपहार

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