रिश्तों की पगडण्डी पर
चलते चलते
भौतिकता की फिसलन में
संभल नही पाते कदम
और आधुनिकता की
बैसाखियों में ढूंढते सहारा
क्या मंजिल तक
पहुंचा सकेंगे
कल्पना के पंख ।
परिंदों ने कहाँ सीखा
ये हुनर
आसमां ने तो नही की
कभी फिरका परस्ती ।
फिर हमने कहाँ से
सीख लिया
शून्य होती संवेदना का
गणित ।
शायद पढ़ लिया है हमने
संवाद हीनता का व्याकरण
तभी भूल गए हम अहसासो
की शब्दावली ।
-----------अनिल उपहार -------
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