Saturday, January 28, 2017

विश्वास (कविता)

हर्फ़ हर्फ़ तेरा बिखरना
प्यास बन  अधरों पर ढलना
अश्रु की स्याही से
समृति के पृष्ठ पर
लिख देना
अलसायी आँखों की दासता ।
ये हुनर कहाँ से सीखा तुमने
सांसों के स्पंदन से बिखरे
सुरीले स्वर
गवाही नही है उस
अप्रतिम अहसास की
जिसके तुम
बेजोड़ कारीगर होने का
दम्भ  भरते थे ।
सच तो यही है
और
किसी शिल्पकार की
नायाब तराशी गयी
मूरत में
नक्काशी से
निखर कर सजीव हो उठने के
सारे गुण धर्म समाहित है
तुम्हारी आभा में ।

अनिल उपहार

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