संवेदना के आईने में
नही उभरता
अब कोई अक्स
अपनेपन का ,
शब्दों के रुमाल
झाड़ने लगते है
स्वार्थ की महीन
धूल ।
गरीब होती
वैचारिक सम्पदा
अस्तित्व खोते
संस्कार युक्त वैभव ने
लिख दिया है लेखा जोखा
समय के भाल पर ।
इतिहास लिखेगा
वृतांत
कर्मो की स्याही से ,
तब नही होगा सामर्थ्य
बांचने का ,
पथराई आंखों में ।।।।
#अनिल जैन उपहार
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