हमने तुमको अपना माना मान दिया सम्मान दिया।
जैन जगत के साथ क्यूं तुमने सौतेला व्यवहार किया।
निर्वाण भूमि यह तीर्थंकर की मन चाहा पा जाते है।
भक्ति भाव से वंदना कर के भव सागर तीर जाते है।
सबसे ज्यादा टैक्स हम देते दान भी हम ही देते है।
चींटी तक को कष्ट न पहुंचे ऐसा जीवन जीते है।
धर्म संस्कृति की रक्षा हित हमने प्राणों का लोप किया
राष्ट्र ने दी आवाज हमे तो हमने अभिनंदन सौंप दिया।
सम्मेद शिखर पर मोज मस्ती का बाज़ार नहीं फलने देंगे।
सत्ता के मद में अंधों का व्यापार नहीं चलने देंगे।
विनम्र निवेदन शासन से कि आदेश ये अपना वापस लो।
सम्मेद शिखर गौरव जैनों का उनको उनका गौरव दो।
डा अनिल जैन उपहार
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