काव्यांजलि
Tuesday, December 6, 2022
मुक्तक
वो रस्में सारी उल्फत की पल में तोड़ आया मैं ।
मिला था जो विरासत में उसे भी छोड़ आया मैं ।
शहर की चौंध याति रोशनी ने कर दिया अंधा
बूढ़ी माँ के हाथों के निवाले छोड़ आया मैं ।
अनिल जैन उपहार
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