Saturday, January 7, 2017

कविता बेटी (आस्था आलंबन और विश्वास)

आस्था, आलम्बन ,विश्वास,
सदियों  से  यही  तो  चाहा  था,
तुमसे  इस  समाज  ने |
कभी  तुम  ययाति  की  बेटी 
माधवी  बन ,उत्सर्ग  करती  रही |
कभी  त्रेता  की  रेणुका  बन,
नही  पूछ  पाई  कोई  प्रश्न 
अपने  पति  या  पुत्रों  से |
कभी  तुम  अहिल्या  बन,
युग  युगों  तक  इन्द्र  के  पाप  का 
दण्ड  भोगती  रही-
जबकि  जानते  थे  सब,
की  तुम  छली  गई  हो,
द्रोपदी  के  चीर  हरण  से  लेकर 
सामूहिक  बलात्कार  कांड  तक |
हर  बार  तुम्हीं होती  रही,
सामाजिक  एवं  मानसिक  रुग्णता  की 
         शिकार |
तुम्हारी  इस  दशा  के  लिए 
आखिर  कौन  है  जिम्मेदार ?
समाज  की  सामंत  वादी  सोच 
          या 
सुन्न  पड़ी  संवेदना |
कभी  तुम  कबीर  की  वाणी  का 
आधार  बनी,
तो  कभी  जायसी  के  स्वच्छंद  प्रेम 
की  अभिव्यक्ति-
फिर  भी  ,हर  बार  तिल  तिल  कर 
मरती  रही  हो  तुम, और 
यह  समाज  हर  बार  शब्दों  के  मरहम  से 
भुनाता  रहा  तुम्हें |
निर्भया  |तुम्हांरी  मौत  ने 
खड़े  किये  है  अनेक  सवाल |
वो  सारे  प्रश्न है  आज  भी 
अनुत्तरित |
जो  शाश्वत, सार्वभौमिक, और  सर्वकालिक 
उत्तर  अवश्य  ही  ना  बन  पाए |
इन्हीं  में गुम  है  तुम्हारी  रूह  के 
ताज़ा  ज़ख्म,
जो  बयां  कर  रहें  है- 
औरत  होने  की  अंत  हीन  पीड़ा  कों |
-----अनिल उपहार -------

anil uphar at 9:53 PM

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3 comments:

SUKHMAL JAINFebruary 1, 2014 at 10:17 PM

aapki kavita lajavab hai badhai

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SUKHMAL JAINFebruary 1, 2014 at 10:21 PM

aap ki rachnaye bejod hai aise hi maa sharde ke bhandar ko bhrte rhe

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anil upharFebruary 2, 2014 at 9:18 AM

आपकी होसला अफजाई के लिए दिलसे आभार

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