भावनाओं के सेतु से तुम्हारा
बैखोफ गुज़र जाना ।
और कदम दर कदम
छोड़ जाना ऐसे निशां
जिन पर लिखे को
कोई बांच नही सकता ।
नफरत की अंधी खाई को
कोई पाट नही सकता ।
शायद ये फितरत नही तुम्हारी
सिर्फ फ़िज़ा में छाया वो धुंवा है
जो देखने नही देता
तुम्हारी आँखों कों
रिश्तों की सच्चाई ।
तभी तो उतर आते है
इन आँखों में संशय के ज्वार ।
और लगा देते है
अपनी परम्परागत मुहर
पराये को पराया समझते रहने की ।
---;;;;अनिल उपहार
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