संस्कारों की सड़क के मुसाफिर की तरह
भावनाओ के सेतु से
तुम्हारा बेख़ौफ़ गुजरना
निश्छलता के धूमकेतु सा
संबंधों के आकाश में
स्थापित हो
अपनी अद्वितीय आभा से
रिश्तों के धवल पृष्ठ पर
लिख देना एक ऐसी इबारत
जिसे वक़्त की आंधी
मिटा नहीं सकती
स्वार्थ का जल धो नहीं सकता ।
कहाँ से लाऊँ
उपमान प्रतिमान
संवेदना की स्याही
जिसे बांच सकूँ
और लिख सकूँ
कोई खंड काव्य तुम पर
बस लिखता रहूँ तुम पर
बस तुम्ही पर।।।।।।।
अनिल उपहार।।।।।।
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