मैं लिखूंगा कोई नव गीत
फिर से
स्मृति के कैनवास पर ।
गुज़रे पलों को
बनाऊंगा साक्षी ,
और
यादों के सुनहरे वरक़ पर
खिल उठेंगे सतरंगी स्वप्न ,
अलसायी भोर के आगोश में ।
नया दिनमान उतरेगा
लेकर कविता का मुहूर्त ।
और तुम देना उसे अपने स्वर
तब देखना
अधरों पर होगा
मिलन का मंगलाचार
जब तुम गुन गुनाओगे
साकार होजायेगा
रिश्तों का व्याकरण ।
अनिल उपहार
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