चाहे ज़ख्म सहे होंगें हर चोट नेह की भाषा है ।
तारे गिन गिन रात गुज़ारें जीवन की अभिलाषा है ।
दोराहे पर शब्द मौन है भोर खड़ी है द्वारे पर
रात यही कहती है दिन से घोर निराशा में आशा है ।
अनिल उपहार
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