काव्यांजलि
Thursday, January 23, 2014
मुक्तक
------------------
तुम कृति सुन्दर धरा की,
शांती की रस धार हो |
विरह गीत के छंद जैसी ,
तुम करुण मनुहार हो |
कह्दूं रुबाई मीर की या,
गज़ल ग़ालिब की तुम्हें |
तुम मधुर वीणा सजन की,
प्रणय का श्रृंगार हो |
-------अनिल उपहार ------
2 comments:
काव्यांजलि
January 31, 2014 at 8:54 AM
आभार आपका
Reply
Delete
Replies
Reply
काव्यांजलि
January 31, 2014 at 8:55 AM
आभार आपका
Reply
Delete
Replies
Reply
Add comment
Load more...
Newer Post
Older Post
Home
View mobile version
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
आभार आपका
ReplyDeleteआभार आपका
ReplyDelete