उसकी हर चोट शिल्पी बन तराशती रही ।
खुद बुत बना ख़ामोशी ओढ़ निःशब्द हो गया । तहज़ीब के दुशाले अब भी है रोशन उसकी हर आहट पर अंकित है साथ गुज़रे हुए पलों के सवालिया निशां ।
अनिल उपहार
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