Sunday, May 7, 2017

कविता(सन्नाटा)

दूर तक फैला सन्नाटा
ख़ामोशी की चादर ताने
अलसाये जज़्बात
कैसे जाने मायने दोस्ती के
शायद  विवश रहा होगा
शब्दकोश तुम्हारा ।
हम पढ़ नही पाये
तुम समझ नही पाये ।
तभी तो
प्रश्नों की एक लम्बी श्रृंखला
खीच गयी थी दीवार ,
हमारे दरमियाँ ।
खामोश तुम
खामोश हम ।
निःशब्दता खड़ी है
पैर पसारे ।

अनिल जैन उपहार

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