Saturday, May 6, 2017

पराकाष्ठा(कविता)

खो देने का भय
पाने की उत्कण्ठा
मर्यादा की देहरी तक ,
सम्बन्धो के सेतु से
गुजरते अहसासों पर ,
बनते बिगड़ते रिश्तों का
अर्थ खोजने लगती है -
आत्मविश्वास
दृढ़ होने लगता है ।
मन बुनने लगता है
शब्दों के ताने -बाने
शब्द शहद की तरह
घुल जाते है रोम रोम में
शायद यही तो नहीं
प्रेम की पराकाष्ठा ।।।।।

अनिल उपहार

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