भोर ने उजली किरण से धरा को फिर जगमगाया ।
फागुनी नवगीत रचकर होले से ये गुनगुनाया ।
देहरी की द्वार से न अब रहे कोई भी अनबन
भुलाकर सब लगाओ दिल नया देखो समय आया ।
----------अनिल उपहार ------
फागुनी नवगीत रचकर होले से ये गुनगुनाया ।
देहरी की द्वार से न अब रहे कोई भी अनबन
भुलाकर सब लगाओ दिल नया देखो समय आया ।
----------अनिल उपहार ------
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