तहजीब का सुहाना वो मंज़र छोड़ आये है ।
मुहोब्बत के वो सारे शजर छोड़ आये है ।
चादर से जियादा पांव फैला लिए हमने
पुरखों का हम वो गाँव वो घर छोड़ आये है ।
-------अनिल उपहार --------
मुहोब्बत के वो सारे शजर छोड़ आये है ।
चादर से जियादा पांव फैला लिए हमने
पुरखों का हम वो गाँव वो घर छोड़ आये है ।
-------अनिल उपहार --------
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