ओ वीणापाणी आज ह्रदय के तारों को झंकृत करदो।
बैठो जीभ की जाजम पर हर इक शब्द अलंकृत करदो।
दौलत और ये शौहरत तो बस तेरी ही तो बदौलत है
मेरे गीत ग़ज़ल छन्दों को आओ आज पारिष्कृत करदो।
अनिल उपहार। ।।।।।
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