राह कंटीली बेशक हो पर हँस कर फूल बिछाओ तुम ।
सन्नाटे टूटे हर एक दिल के ऐसा मृदंग बजाओ तुम ।
भीषण ज्वाला नफरत की ये छींटे हो सदभावो के
मानव हो तो मानवता का सच्चा धर्म निभाओ तुम ।
---------अनिल उपहार --------
सन्नाटे टूटे हर एक दिल के ऐसा मृदंग बजाओ तुम ।
भीषण ज्वाला नफरत की ये छींटे हो सदभावो के
मानव हो तो मानवता का सच्चा धर्म निभाओ तुम ।
---------अनिल उपहार --------
No comments:
Post a Comment