Friday, March 27, 2015

आज हमारी माताजी की पुण्य तिथि है जो आज ही के दिन अपनी अनंत यात्रा पर प्रस्थान कर गयी थी ।उन्हीं को समर्पित कुछ शब्द सुमन ।।।।।।

-------माँ------------

तुमने संस्कारों के बीज रोप

संघर्षों के झंझावात और

असहनीय पीड़ा को भोगते हुए

लगाया था जो बिरवा ,

आज पल्लवित और पुष्पित होते देख

मन ही मन प्रसन्न होती थी तुम ।

        हे माँ !

तुम्हारी रिक्तता अब नही भर पायेगी

मन के सूने पन कों ।

उदासी और संस्कारों के स्पंदन को ।

लेकिन तुम्हारी दुआओ के दीप जगमगाएंगे ,

रोशन करेंगे सूनी राहों को ,

प्रकाशित करेंगे ,उदास हवाओं को ।

काश ! मै समझ पाता माँ होने की परिभाषा

और लिख पाता एक महाकाव्य तुम पर

मेरे गीत और छंद पुकारते है तुमको

लेकिन मै जानता हूँ कि तुम कभी नहीं लौटोगी उस यात्रा से

हे ! ममतामयी ,देवी स्वरूपा,

वात्सल्य मूर्ति माँ !तुम्हें अनंत प्रणाम ।।

--------अनिल उपहार -----

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