Friday, March 27, 2015

ओ दरिंदो(कविता)

ओ इंसानियत के दरिंदों
अमन के दुश्मनों
मज़हब को जेहाद का
ज़ामा पहनाने वालों
मासूमों के खून में
कलम डुबोकर
अपनी माँ कों
ख़त लिखना ।
कि माँ
हमने अपने कृत्यों से
आज तेरी कोख़ कों
दुनियां में शौहरत दिला
तेरे दूध कों
शर्मसार कर दिया ।

उग्रवाद की ज़मीन पर
आतंक के बीज बोने वालों
शायद तुम नहीं जानते -
कि
जिन बस्तों कों तुमने
अपनी गोलियों का निशाना
बनाया
उस बस्ते का एक भी अक्षर
अगर बिखर गया
तो शब्दों की गूंज
तुम्हारी गोलियों की गूंज को
नेस्त नाबुत कर देगी ।

पर तुम्हें इससे क्या ?
तुमको कहाँ अंदाज़ा ?
पूछो उस माँ से
जो अब कभी
टिफिन नही बांधेगी ।
पूछो उन बूढी आँखों से
जो उनसे लिपट कर कहेगी
कि बाबा हम स्कूल से लौट आये ।

सजे धजे ये कोमल
मासूम से बच्चे
जिन्हें पलने में होना था
तुमने
ताबूत कैसे दे दिया ????????

---------अनिल उपहार -------

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