उम्मीदों का हँसी सावन बरसता छोड़ आया हूँ ।
मै अश्कों के समंदर कों उफनता छोड़ आया हूँ ।
कागज़ी चंद टुकड़ों ने बना खुद गर्ज़ जब डाला
मेरी माँ की निगाहों कों तरसता छोड़ आया हूँ ।
----------अनिल उपहार ------
मै अश्कों के समंदर कों उफनता छोड़ आया हूँ ।
कागज़ी चंद टुकड़ों ने बना खुद गर्ज़ जब डाला
मेरी माँ की निगाहों कों तरसता छोड़ आया हूँ ।
----------अनिल उपहार ------
No comments:
Post a Comment